हमारी #संस्कृति अर्थात उत्तराखंड की संस्कृति का नाम चाहे आप #उत्तराखंडियत कहिए या #हरिद्वारियत कहिए, दोनों एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। मगर यह हरिद्वार में #बंदूकियत कहां से आ गई है??
जिस समय पंचायतों के चुनाव में बूथ कैप्चर किए गए थे, लठ्ठ के बल पर चुनाव के रिजल्ट घोषित करवाए गए थे और पुलिस बल का सहारा लेकर विपक्षियों पर मुकदमे दर्ज करवाए गए थे। मैंने उस समय भी आवाज उठाई थी और अपनी बेटी विधायक अनुपमा रावत एवं अन्य साथियों के साथ बहादराबाद थाने में दिन-रात धरने पर बैठे थे।
आज फिर वह संस्कृति मंगलौर के चुनाव में हावी होते हुए दिखाई दी, हम सब उससे लड़े और अब यह जो कुछ हुआ है, यह उसी का एक नग्न रूप है जो हमें शर्मसार भी कर रहा है और एक खतरनाक प्रवृत्ति को और आगे बढ़ा रहा है, यह कौन लोग हैं? इन चेहरों को यदि आप पहचानेंगे तो इनके संरक्षक भी आपके सामने बिल्कुल स्पष्ट हो जाएंगे, संरक्षकों के चेहरे भी बेनकाब हो जाएंगे और आपको यह करना होगा। यदि उत्तराखंडियत बचानी है, हरिद्वारियत बचानी है। गंगा-यमुना, केदारनाथ, बद्रीनाथ, जागनाथ-बागनाथ और हरिद्वार की संस्कृति को बचाना है तो फिर आपको इस तरीके की बढ़ती हुई प्रवृत्तियों के खिलाफ एकजुट होकर के लड़ना पड़ेगा, चाहे आप किसी भी राजनीतिक दल से हो या किसी सोच के हों।

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